'द्वेष '
न तेरा सूकून न उसका
वो जमीं ही सरका दी
जहां ये मुमकिन था।
अब हवाओं मे हो तुम
बेपर यूं न तड़पते
गर अपने पावों पर एतबार होता।
अपनी तड़प का अहसास
हो तो दवा हो जाए
तुम्हे तो सिर्फ़ उसके
दर्द का इंतजार था।
खुद को आगे बढ़ाने से खुद को रोका
आकर कोई चलाए भी
तो ये चलना न था।
लाख देख लो जमाने की ओर
रोशनी गर दिल मे नही तो
हर तरफ अंधेरा ही था।
'राजीव जिनराज '
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