Thursday, 18 June 2026

द्वेष

'द्वेष ' न तेरा सूकून न उसका वो जमीं ही सरका दी जहां ये मुमकिन था। अब हवाओं मे हो तुम बेपर यूं न तड़पते गर अपने पावों पर एतबार होता। अपनी तड़प का अहसास हो तो दवा हो जाए तुम्हे तो सिर्फ़ उसके दर्द का इंतजार था। खुद को आगे बढ़ाने से खुद को रोका आकर कोई चलाए भी तो ये चलना न था। लाख देख लो जमाने की ओर रोशनी गर दिल मे नही तो हर तरफ अंधेरा ही था। 'राजीव जिनराज '

Wednesday, 25 December 2024

समीक्षा: "विभाजन का दंश#" के विश्लेषण मे लेखक के अनुभव का रचना के रुपांतरण पर सोद्देश्य पूर्ण चर्चा का प्रयास कृति की रचनात्मक अन्विति को दृष्टिगत रखते हुए है रचना मन को बांध कर रखती है एवं मन आसानी से इसको भोगे हुए यथार्थ का मार्मिक चित्रण स्वीकार करता है इस समर्थन मे यह प्रश्न भी आ सकता है कि फिर यह एक आलेख, दस्तावेज या डाक्यूमेंट्री तो नही। परन्तु पुस्तक पठन के पश्चात स्पष्ट रुप मे यह स्वत: प्रमाणित हो जाता है कि यह विशुद्ध कलात्मक रचना है जिसने अपनी उत्पत्ति के अवयव यथार्थ से लिये हैं जिसमे की विचार रुपी बीज का विकास परिवेशगत मिट्टी व जल वायु द्वारा हुआ है। विभिन्न संस्कारों की खाद द्वारा पोषित रचना के वृक्ष पर सुन्दर फूल व फल वास्तविक है सौन्दर्य पूर्ण एवं कलात्मक हैं। यह रचना सृजन की वही अनदेखी प्रक्रिया से गुजरी है जो पीढ़ा से उत्पन्न होती है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार भी सत्य का संचरण गल्प मे सुगमता से होता है। नाटक मे कथा की विषयवस्तु, प्रसार व पात्र बहुत वास्तविक व अपने करीब लगते है।नाटक मंचन की दृष्टि से लिखा गया है व सर्वथा उपयुक्त है। यह रचनाकार की अभूतपूर्व सफलता दर्शाताहै। कथा विन्यास व परिवेश गत द्वंद, विभिन्न पात्रों के साथ समीपता प्रेम, करुणा,वितृष्णा एवं आक्रोश संचरित होता है। कथा सोचने पर बाध्य करती है और यही एक कलात्मक रचना का महान उद्देश्य होता है। भाषा का चयन समाज मे अंग्रेजी के सर्व व्यापी प्रभाव को भी दर्शाता है। रचना, पूर्व कालिक परिप्रेक्ष्य एवं अतीत से वर्तमान का सन्दर्भ भी जोड़ती है और भविष्य मे झांकने का सूत्र छोड़ जाती है। राजीव जिनराज
प्राक्कथन- अपने मित्र द्वारा लिखित पुस्तक "विभाजन का दंश# "हाथ मे लेकर उसको उलट पलट कर लेखक परिचय को सघन भाव से गूढ़ते रोमांच से ज्यादा गर्व का अनुभव हुआ । रोमांच, रचना मे सन्निहित शंकर दादा के जिये हुए यथार्थ मे पसरे अनुभव का, उसकी अनुभूति के सम्प्रेषण का, उनके साक्षात्कार का, सत्य अनावरण का, इत्यादि इत्यादि जो पुस्तक चर्चा पर उत्तरोत्तर प्रकट होगा। गर्व,अभिव्यक्ती के शक्ति दर्शन व उसके निकट साक्ष्य होने का।

Friday, 20 December 2024

'सीमाए' किसी मर्यादा मे तो रहे किसी का मर्यादा से पार हो जाना न हो सरोकार, गुरुत्व से,मूल्यों से,संस्कारो से निर्णय तो लेना है स्वयं की हवा बांध रखने का या कि वायुमंडल मे विलीन हो जाने का। कोई विचार मे ही रहे अवश्यमेव ही निकट होना अभीष्ट नही समय,साधनो के संकट से घिरा जीवन्त रहे निर्जीव का समीप होना भी वांछनीय नही स्पंदन का बंधन पर्याप्त है।

Wednesday, 4 December 2024

वो क्षण

जिन्दगी भी अजब धुआं धुआं न खाली न भरी हुई कुछ खालीपन भरना है कुछ भरे को उड़ेलना कुछ झाड़ कर खाली करना पर रुके नही चल पड़ना यूं जैसे ये लगे ठहरी हुई। जंगलों के परे कईं जंगल फैले हुए जबकि हर जंगल स्वयं मे पूर्ण फैलाव स्मृति को धुंधलाते पुकारते किस एक क्षण मे अहसास की जमीन गहरी हुई।

जीवन इक पल

जन्म होते ही शिशु का रुदन तत्पश्चात मुस्कान व अधरो को खोल खिलखिलाहट इस अन्तराल मे यह दैवीय अंतर्ज्ञान कि जीवन रुपी पीढ़ा की वहनियता का अन्य विकल्प नही। यह ज्ञान यात्रा का आरम्भ से अन्तिम श्वास तक मात्र एक पल का विस्तार। सम्पूर्ण जीवन को समाये।

आशा

तय है आंखो मे गुजरा कल नही आने वाले पल की चमक हो ऊपर दिमाग की मंजिल से उतर जब दिल की खिड़की से नजर उऊपर उठी बादलों के पीछे आसमान नीला था

Wednesday, 17 June 2020

जिस जिन्दगी की बस मे मै चढ़ा ठीक से खड़े होने की जगह न थी एक पांव टिका था कहीं दूसरे की खबर न थी दर्द के टुकड़े पेवस्त थे नज़ारो मे मरहम दूर तक नदारद रहे नसीहतो कि मगर कमी न थी हम समझ कर भी खामोश रहे नासमझ शोर मचाते रहे जो रास्ते गुजारते रहे जिन्दगी मेरी पत्थर खंगालने मे उन्ही पर कुछ लोग अपने रहनुमा तराश कर आसानी से मंजिल नापते रहे हर कदम ,कायदा या रवायतो की दुहाई मिलती रही कुछ पाबंद रहे कुछ सहूलियत से पैबंद लगाते रहे छूटता नही सफर न बदले रास्ते इसी कारवां मे हम मकसद तलाशते रहे तरक्की शुदा ढांचे पर हावी रहे तरक्की पसंद आदतन इसे सवांरते रहे बस चल रही थी कुछ के नसीबो करम से उन्को ही पहले मौके पर वो उतारते रहे मंजिल न सफर की मजबूरी थी कोई हम तो हर बार कदमो को उनका वजूद देते रहे

Tuesday, 14 April 2020


Love is forever, From Hearts, in Hearts, By Hearts, Relation made Through Blood, Relation moves in Blood, If no oxygen given by heart to blood..... Relation dies.

Monday, 6 April 2020

It was told that Religion is an Opium Still We follow it We give preference to our Religion over our 'Dharma' Because since childhood we are used to it In childhood virtually it was imposed,when no consciousness was there. There should be freedom to choose Religion according to individual's urge of his/her 'Dharma' after attaining consciousness say at the age of 21. Suitable amendment to be made in constitution that no religion by birth it is only after attaining the age of 21.#
अपने अपने जहां में बसे

अपनी अपनी ज़मीन पर खड़े

अपना फलक सजाये

वज़ूद  की तलाश मे सफर किये

ताउम्र इस एहसास मे सज़दा किये

कि ये वो मंज़िल तो नही

कि जहा सफर खत्म हो...

आरजुएं मिटे और रूह का क़र्ज़ अदा हो

तेरे जहां मे वो जहां कहां ढूंढे

कि कर्ज़दार खुदी के फलक पर मुकम्मल हो।
Rajiv jinraj

Wednesday, 28 December 2016


जिन्दगी ए जिन्दगी

उसमे और कुछ भावुक बुद्धिजीवि लोगो की सोच मे
इतना ही फर्क था
कि वो सोचते थे
कि लोग जीते कैसे हैं
ओर वो सोचता था कि
लोग जीते क्यो हैं
' कैसे' की तरफ उसका द्य्यान नही था
क्योकि सुधार मुमकिन न था
क्योकि सुधार लोकतंत्र चुनता है
' क्यो' की तरफ उनका भाव न था
क्योकि जवाबो के बिना सवाल कैसे
वो जिन्दगी की कहानी कहते रहे
वो जिन्दगी ढूंढता रहा
वो जी रहे थे,
 जब वो सोचता  है   कि
मौत कैसी होनी चाहिये,
अक्सआता है।
हर हाल मै जिन्दादिल,
. . . . .
पर उन्हे मौत से नफरत है। ।
. . . . .

Sunday, 7 August 2016

अात्मा से वार्ता.
जारी.
जन्म दिन की शुभकामनाओं के साथ🌹💐🌺🌹💐🐾❤🏂

तेरे द्वारा  प्राणजनित भव सागर,
कालचक्र मे नौका की पतवार
हर लहर का तुझसे अकंन
हर भंवर से तेरा पार
प्राण जनित भव सागर मे
मेरी नौका कि पतवार,
तेरे दर्शन दीनो मे है
हर इमां तेराआकार
तुझ को झुठलाते  है अहं अक्सर
अोोर निर्लिप्त् रहता तेराआवाहन,
किस का हाथ पकड़ कर ?
सम्पूर्ण जीवन यात्रा मे अविचल,
स्वयं मे पूर्ण भव का गान
कण मे गिरि का मान
क्षण मे पूर्ण युग का भान,
एसा तेरा साक्षात्कार,
रहे विभूषित सदा
विनिर्दष्ट संकेतो का संचार
हर दिन  जन्म दिन अनुभव हो
हर पल जुड़े हो तुझसे तार🙏🌹💐❤
आत्मा तू कहां है
मुझे हमेशा तेरी याद रहती है
अपार दुखों मे भी एक अनदेखा सहारा रहता है
तेरे दर्पण मे सदैव खुद को सवांरा करता हु
फिर भी क्यों धूमिल सा रहता हूं
ये कर्मो की धूल है या
मै तुझको न समझा
मेरी समझ की धूल?
सदैव तेरेै एहसास मै जिया
मैने खुद को तेरी दीवारों मे
बन्दी किया,
न मिला सिला बन्दगी का
ना मिला दीदार जिन्दगी का
ये मेरी समझ की धूल है
या मेरी कोइ भूल है
 तेरे साथ मेरा रहता सदा व्यवहार है
पर फिर भी क्यों रहती सदा दीवार है?

Happy friend ship Day🌹
hope enjoying friendship with life
do honour it
do respect it
love it
feel it
hold it
don't think to escape ever
have faith on this
have faith in you
you and all relations in your life
may florish
seed of empathy care ,humility.....blossom🌹💐

Tuesday, 12 July 2016

पलो के साथ अहसास
क्षणों के संग यादें
बातों के पीछे पहलू
पर्तो मे छिपा सच होता है,पर.
बड़ा तेज रप्तार ओ खुदमुख्तार
चल रहा जिन्दगी का व्यापार
कि बातें नहीं मुकम्मल
 टुकड़ो मे बातें या बातों के टुकड़े  हैं,
पर टुकड़ो मे सच्चाइ की बात होती हैं🌺

Sunday, 10 July 2016

छलियें बनाम साधारण जन:
एक गीत,


धूप को धूप न कहें
रुप को रुप न कहें
बेहयाइ को सुन्दर बना दे
चुल्लु को समंदर कहें

बन्दगी मतलब की करें
सच को कहने से डरें
आखं से अन्धे बने रहें
चलने वाले को ठोकर लगा दे

मानव मन ढूंढता है भरोसे
तोड़ने वाले है बहरुपिये
पूजा को न जाना आस्था न पहचाने
बना दिये पावन पथ सियासत के अड्डे

ये दुनिया रहे लहरों के भरोसे
जन न उभरे गृह चिन्ता से
विशाल शक्तिया सुप्त पड़ी
विकृत,स्वकेन्द्रित, मन हुकूमत करें
मसूरी सफर ओ पड़ाव:

सेल्फी से ज्यादा सफर पे ध्यान दो
 बिखरी सुन्दरता हेे निहारो
बाहरी तो है सबके पास
मन की आखों से काम लो🌹🌺🍇🎂💐

: हवाओ पे बादलो का साथ
धरती का आस्मां पे राज
ये मंजर नही मामूली
मन मे समेट लो आज

नजारे ही नही खुश्बुये भी निराली
है हकीकत, नही कोइ फिजां ख्याली
जिन्दगी का गणित फना हो जाता है
जवाब देते हैं, पर्वत बने सवाली

रात को पर्वतो की रानी का रुप और निखरता है
घाटियों मे सितारो काआंचल बिखर जाता है
माथे पर ताज है आलौकिक
खुली आंखों मे सतरंगीं ख्वाब घर कर जाता है

दिल मे बस कर नींद को गहरा कर जाता है
जो कहीं न मिले वो सूकून यहां मिल जाता है
लगता है जैसे पू्र्ण हो हर अभिलाषा
गुजरते पलों को अमरत्व काआर्शीवाद दे जाता है

Saturday, 9 July 2016

: बहुत से कोने खुदरे हैं अन्दर
जिसकी पैमाइश मुझे पता है
बाहर तो समरुपता है
कयों किसी को हिसाब दिया करु

: अजीब तमाशा है जिन्दगी
ना खुलासा है, ना बन्दगी
जंग जब खुद से हो
लहु पानी की तरह बहता है
दर्द की इन्तहा का भी
एहसास नही रहता है
वो मैदान भी मेरा नही
इस दुनिया का ही दावा रहता है
कौन है जिसने इस दुनिया मे पिरोया
मै भी टूटा माला भी तोड़ कर चला गया
ये इम्तहान फिज़ुूल है या कोइ मायने रखता है
जब अर्थ की लड़ाइ खद की है
तो किसी को क्या साबित करना है