Sunday, 10 April 2016

ओझल पूर्णता



अपने अपने जहां में बसे

अपनी अपनी ज़मीन पर खड़े

वज़ूद  की तलाश मे सफर किये

ताउम्र इस एहसास मे सज़दा किये

कि ये वो मंज़िल तो नही

कि जहा सफर खत्म हो...

आरजुएं मिटे और रूह का क़र्ज़ अदा हो

तेरे जहां मे वो जहां कहां ढूंढे

कि कर्ज़दार खुद के फलक पर मुकम्मल हो। 

Saturday, 9 April 2016



फरेब  को  दिल मे बसाया तो दहशत है

फरेब को दिल से हटाया तो जिंदगी है

जिंदगी जो जन्म की पहली मुस्कराहट है

मुस्कराहट जो दर्द को भूल जाने ,पी जाने 

स्वीकार  करने की अभिव्यक्ति है

जो फरेब से अनजान है

जिंदगी की पहचान है

बेशक जिंदगी इक फरेब है
 

Monday, 8 June 2015

Jawab jab Kavita hai

ये कहानी तो हम सबकी है
वक्त के हाथ मे जो थपकी है
कूटती पीटती भव सागर से निकालती है
साफ सुथरे हो फिर धूप मे लटकते हैं
मेल निकल जाता है
बस खैर अपने दिल की करनी है
ये रहे तब तक जब तक है जान
इसी से जुड़े ओ निकलते सारे ताने बाने हैं
उसने जो दिया वो सब उसका है
बस इस जहाँ में ये दिल अपना है
दिलो की झील को जोडते रहो
बहुत बड़े महासागर की गाथा है
ये दिल सारी यात्रा कराता है

2.जिंदगी और कुछ नहीं,
कबाड़ की रीसायकलिंग है.
जिस जनम में पहचानो वहीं मुक्ति है,
वर्ना कई जनम लग जाते और
इस ज्ञान के बिना व्यर्थ हो जाती भक्ति है.
ये है सुबह की अजान,
ज्ञान की पहली किरण को सलाम.

3.गनीमत थी की किश्ती रहते ख्वाब की हकीकत खुल गयी,
हमने बहना सीख लिया जब किश्ती पानी में घुल गयी,
क्या साथ देते दुनयावी सहारे इस सफर में,
हमे तो अनन्त सागर की पतवार मिल गयी,
जारी रहे सफर सागरों का
क्या पता मंज़िल मिले
या सफर ही जिंदगी का हासिल रहे

4.ये क्षण जिंदगी में बार बार नहीं आते
आती हैं याद यार बार बार हैं आती
यादो के घर दिल को दिल से मिला दो
बहने दो उन जज़्बातो को जो बाहर नहीं

5,सोचा था तुम भी अकेले हो जिंदगी
और में भी यहाँ अजनबी
मिल कर चलेंगे तो जिंदगी गुलज़ार होगी
पर तुम्हे तो कुछ और ही तलाश थी
जो  तुम्हे मिला या उसकी आस में
मुझसे मुह फेरा
मगर  मैंने  ;अकेला    चलना सीख लिया
सफर तेरे बिना ही सही
रहबर तू भी और दुनिया भी
आया था अकेला जाऊंगा भी अकेला ही
इन्साफ कभी होगा, नहीं इसकी भी आस
वो मंज़िले कहाँ हैं
कोई मुझे बता दे
है इंसान को जिसकी तलाश
 एक राह है जो दिल से निकलती है
जिंदगी मेरे दोस्त
एक आह है जो दिल से निकलती है
सब सूख कर जम जाता है
फिर  फिर  पिघलता है
रुके लम्हे बह जाते है
जिसे हम रवानी कहते है
और अपनी जिंदगी की कहानी कहते है

 

Sunday, 7 June 2015

sarathi

मूल्य विहीन मानव इच्छाओँ के सागर में खोता है

इतना  दिशाविहीन हल्का भी की सदेव कीमतों में  दबा  रहता है

 जीवन रथ की यात्रा में  सारथी है आत्मा

कई जन्मो के परिष्करण ओ भटकाव की गाथा

क्या ये जन्म भी यूँ ही अनजाना रह जाएगा

सारथी मूक ,सुप्त    ओ निष्क्रिय रह जायेगा

रथ दिशाविहीन अनजान डोरियों द्वारा चलता रहेगा

इस सारथी की उस सारथी को पुकार

निरंतर रहे उर्जा ओ प्रकाश अपरम्पार

रहे सारथी जागृत मिलता रहे दिशाज्ञान 

Wednesday, 18 March 2015

हिसाब किताब

कोई ऐसा गणित नहीं
जो जिंदगी का हासिल बता सके
कोई ऐसा लेखपाल नहीं
जो आउटस्टैंडिंग या
बैलेंस बता सके
हिसाब जरूर है, लेखा पूर्ण है
कोई ऐसा मनुष्य नहीं
जो इसे जुठला सके
जिंदगी निरंतर किसी ऋण का
भुगतान है
दुःख इस ऋण मुक्ति की ओर
बल्क पेमेंट है
सुख पूर्व में किये सद्कार्यों
के क्रेडिट का आहरण है
एंट्री मेरे अपने हाथों है
मेरी कलम का नाम विवेक है।


Wednesday, 12 March 2014



 अर्पण तुम्हे यह हार है

 सत्य पर जीवन निसार  है

कल्याण जगत की पुकार है

ये मेरी हार नहीं पर मुझे स्वीकार है

ये जीवन की सुंदरता का श्रृंगार है

 
 जीवनधारा  कल कल निनांद

उत्सर्जित  प्राणो  का अभियान

तुम कहाँ ख़ड़े हो, देख रहे नहीं

बूँद बूँद का  निर्लिप्त बलिदान

ये अविरल  प्रवाह  लगता निर्दुन्द

 सृजक है राग का, बनाता महागान

तुम कहाँ रुके हो  बिना जाने

जलधारा  के संयोजन से अनजान

चट्टानों में सर देकर पर्वतो की पहचान

 झेल रहा अविकल् अनेको झंझावात

देखो लहराते वृक्षो को , कौन  गया

सर्वस्व  होम कर प्रकृती को देकर जान